हर हृदय मेंं कवि हैं - वेपर्द सोये।
स्नेह से सिंचित जगत को,
प्रेममय अवदान देने
-मार्ग का व्यवधान हरने,
कुसुम कलियों को खिलाने ;
दलित,पीड़ित औ बुभुक्षित ;
-प्राणियों की पीड़ हरने ;
कलह, कुंठा, आत्मपीड़न;
भयादोहन, आतंक, शोषण;
औ बाहुबल का दम्भ हरने;
तंत्र-मंत्र औ यंत्र शक्ति को
- सम्यक् सन्मार्ग देने ;
विविध रचनात्मक कदम का
सहज दिव्य संकल्प लेकर;
चराचर के हितों में
मानवता को स्वस्थ करने ;
लोक हेतु स्वयं को करके समर्पित
- स्वप्न को चिरकाल से संजोकर
जोहते हैं बाट - अवसर की,
सम्यक् कर्म की समुचित घड़ी की;
दीखते है नींद में, पर भ्रम यही है-
हर हृदय में कवि हैं- वेपर्द सोये ,
किन्तु भ्रम केवल हमारा -
जो जगे को कब से सोया मानते हैं।
:- डॉ० प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज' ,
पचम्बा, बेगूसराय।
स्नेह से सिंचित जगत को,
प्रेममय अवदान देने
-मार्ग का व्यवधान हरने,
कुसुम कलियों को खिलाने ;
दलित,पीड़ित औ बुभुक्षित ;
-प्राणियों की पीड़ हरने ;
कलह, कुंठा, आत्मपीड़न;
भयादोहन, आतंक, शोषण;
औ बाहुबल का दम्भ हरने;
तंत्र-मंत्र औ यंत्र शक्ति को
- सम्यक् सन्मार्ग देने ;
विविध रचनात्मक कदम का
सहज दिव्य संकल्प लेकर;
चराचर के हितों में
मानवता को स्वस्थ करने ;
लोक हेतु स्वयं को करके समर्पित
- स्वप्न को चिरकाल से संजोकर
जोहते हैं बाट - अवसर की,
सम्यक् कर्म की समुचित घड़ी की;
दीखते है नींद में, पर भ्रम यही है-
हर हृदय में कवि हैं- वेपर्द सोये ,
किन्तु भ्रम केवल हमारा -
जो जगे को कब से सोया मानते हैं।
:- डॉ० प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज' ,
पचम्बा, बेगूसराय।
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