शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

अन्तर्यामी


अन्तर्यामी !
 दिव्य चेतना का हमको नित बोध रहे।
सत्य सनातन धर्म ज्ञान का फैला अन्तर्बोध रहे।
हूँ, मैं कौन ? कहाँ से आया ?
किससे चालित होता हूँ  ?
बोध हमें हो, क्यों हम जीते ?
किस चिर निद्रा में सोते हैं ?
किस विकास का क्रमिक बोध ले,
हम धरती पर आते हैं ?
अन्तर्यामी !
दिव्य चेतना हमको नित बोध रहे ।
सत्य सनातन धर्म बोध का फैला अन्तर्बोध रहे।
:- प्रो०अवधेश कुमार' 'शैलज',पचम्बा,बेगूसराय।

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