गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

भिक्षुक

'भिक्षुक' :-
बस, आज अभी की बात,
पकड़िया के नीचे बैठा था-
नर-कंकाल एक -दुपहरिया की जलती छाया में।
मत कहो इन्हें -भिक्षुक।
ये वेचारे हैं- निर्ममता के मारे हैं।
फँसा दिया है, इनको -समाजवालों ने।
झूठी-अफवाही जालों में।
लूट ली सारी जमीन।
अब,पग रखने को जगह नहीं है।
ये हैं समाजवाले- दलाल, शोषक औ मक्कार।
अपने को कहते- समाजवादी।
ले लिया- जगह, न काम दिया,
न पारिश्रमिक औ न आराम दिया।
सब लिया औ बदले में क्या दिया- सुने.......
बेबसी, अमित व्यथा औ .............
.......अन्ततः -दो मुट्ठी दाने, दो गज वस्त्र हेतु -सदा के लिए भिक्षुक बना दिया........।
:- प्रो०अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय।

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