कबीर कहते हैं:- गुरू वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी सोच के लगन धरी, करम गति टारे नाहि टरे।............
वर्षों पूर्व विद्यार्थी जीवन में ही एक दिन जब मैं 'कबीर दास जी' की उक्त दोहे का अध्ययन कर रहा था, उसी समय महान् कवि एवं संत कबीर दास जी की इन पंक्तियों ने मुझे चिन्तन हेतु प्रेरित किया और मानस पटल पर अधोलिखित पंक्तियों का सहज ही आविर्भाव हुआ, जिसे आप सबों की सेवा में प्रस्तुत किया जा रहा है:-
" जो नर भव बन्धन से निज को निशि-दिन दूर करे। करम गति उनकी सहज टरे।"
:- प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय।
वर्षों पूर्व विद्यार्थी जीवन में ही एक दिन जब मैं 'कबीर दास जी' की उक्त दोहे का अध्ययन कर रहा था, उसी समय महान् कवि एवं संत कबीर दास जी की इन पंक्तियों ने मुझे चिन्तन हेतु प्रेरित किया और मानस पटल पर अधोलिखित पंक्तियों का सहज ही आविर्भाव हुआ, जिसे आप सबों की सेवा में प्रस्तुत किया जा रहा है:-
" जो नर भव बन्धन से निज को निशि-दिन दूर करे। करम गति उनकी सहज टरे।"
:- प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय।
"करे करम प्रकृति-पुरुष भाव से,
शैलज शुचि धरम धरे।
करम गति सदा साथ चले।
जो नर भव बन्धन से निज को,
निशि-दिन दूर करे।
करम गति उनकी सहज टरे।"
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