प्रार्थना :- ' सर्व कल्याणकारी प्रार्थना '
- प्रो० अवधेश कुमार शैलज, पचम्बा, बेगूसराय
प्रियतम स्वामी सुन्दरतम्, माधव! हे सखा हमारे ।
मिलती है शान्ति जगत में केवल प्रभु तेरे सहारे ।
तुम अमल धवल ज्योति हो, ज्योतित करते हो जग को ।
स्रष्टा, पालक, संहर्ता तम एक नियन्ता जग के ।
कैसे मैं तुझे पुकारूँ जड़ हूँ, न ज्ञान मुझको है ।
प्रभु एक सहारा तुम हो, रखनी प्रभु लाज तुझे है ।
सर्वग्य ,सम्प्रभु माधव, तुम तो त्रिकाल दर्शी हो ।
अन्तर्यामी जगदीश्वर,तमहर,भास्कर भास्कर हो।
मायापति, जन सुखदायक, तुम व्याप्त चराचर में हो।
हे अगुण, सगुण परमेश्वर, सर्वस्व हमारे तुम हो ।
आनन्दकन्द, करूणाकर , शशि-सूर्य नेत्र हैं तेरे ।
तुम बसो अहर्निश प्रतिपल प्रभु अभ्यन्तर में मेरे ।
तेरी ही दया कृपा से अन्न धन सर्वस्व मिला है ।
तेरी ममता इच्छा से यह जीवन कमल खिला है ।
उपहास किया कर ते हैं जग के प्राणी सब मेरे ।
स्वीकार उन्हें करता हूँ , प्रेरणा मान सब तेरे ।
कर्त्तव्य किया न कभी मैं,प्रभु प्रबल पाप धोने का ।
जुट पाता नहीं मनोबल , प्रभु अहंकार खोने का ।
बस, तिरस्कार पाता हूँ,यह पुरस्कार है- जग का ।
है बोध न मुझको कुछ भी, जगती का और नियति का ।
यह जीवन चले शतायु, मंगलमय हो जग सारा ।
माधव ! चरणों में तेरे, जीवन अर्पित हो सारा ।
हे हरि ! दयानिधि, दिनकर, सब जग के तुम्हीं सहारे ।
हम सब को प्रेम सिखाओ, हे प्रेमी परम हमारे ।
हो बोध हमें जीवन का, कर्त्तव्य बोध हो सारा ।
अनुकरण योग्य प्रति पल हो, जीवन आदर्श हमारा ।
सार्थक हो जग में जीवन, सार्थक हो प्रेम हमारा ।
माधव चरणों में तेरे, जीवन अर्पित हो सारा ।
:- प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय ।
- प्रो० अवधेश कुमार शैलज, पचम्बा, बेगूसराय
प्रियतम स्वामी सुन्दरतम्, माधव! हे सखा हमारे ।
मिलती है शान्ति जगत में केवल प्रभु तेरे सहारे ।
तुम अमल धवल ज्योति हो, ज्योतित करते हो जग को ।
स्रष्टा, पालक, संहर्ता तम एक नियन्ता जग के ।
कैसे मैं तुझे पुकारूँ जड़ हूँ, न ज्ञान मुझको है ।
प्रभु एक सहारा तुम हो, रखनी प्रभु लाज तुझे है ।
सर्वग्य ,सम्प्रभु माधव, तुम तो त्रिकाल दर्शी हो ।
अन्तर्यामी जगदीश्वर,तमहर,भास्कर भास्कर हो।
मायापति, जन सुखदायक, तुम व्याप्त चराचर में हो।
हे अगुण, सगुण परमेश्वर, सर्वस्व हमारे तुम हो ।
आनन्दकन्द, करूणाकर , शशि-सूर्य नेत्र हैं तेरे ।
तुम बसो अहर्निश प्रतिपल प्रभु अभ्यन्तर में मेरे ।
तेरी ही दया कृपा से अन्न धन सर्वस्व मिला है ।
तेरी ममता इच्छा से यह जीवन कमल खिला है ।
उपहास किया कर ते हैं जग के प्राणी सब मेरे ।
स्वीकार उन्हें करता हूँ , प्रेरणा मान सब तेरे ।
कर्त्तव्य किया न कभी मैं,प्रभु प्रबल पाप धोने का ।
जुट पाता नहीं मनोबल , प्रभु अहंकार खोने का ।
बस, तिरस्कार पाता हूँ,यह पुरस्कार है- जग का ।
है बोध न मुझको कुछ भी, जगती का और नियति का ।
यह जीवन चले शतायु, मंगलमय हो जग सारा ।
माधव ! चरणों में तेरे, जीवन अर्पित हो सारा ।
हे हरि ! दयानिधि, दिनकर, सब जग के तुम्हीं सहारे ।
हम सब को प्रेम सिखाओ, हे प्रेमी परम हमारे ।
हो बोध हमें जीवन का, कर्त्तव्य बोध हो सारा ।
अनुकरण योग्य प्रति पल हो, जीवन आदर्श हमारा ।
सार्थक हो जग में जीवन, सार्थक हो प्रेम हमारा ।
माधव चरणों में तेरे, जीवन अर्पित हो सारा ।
:- प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय ।
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