आज का ताजा खबर... :-
'आज का ताजा खबर'
आज का ताजा खबर.........
बाबू जी, आ गया- आज का ताजा खबर....।
बाबू जी, आ गया -आज का ताजा खबर......।
बाबू जी , आ गया -आज का ताजा खबर.....।
पड़ी कान में मेरी, फट सा गया हृदय,
आँखें रह गई, पड़ी पथराई सी।
बज रहे सात थे- रात्रि के।
था ठिठुर रहा, जाड़े के भींगीं रातों में,
जैसे सरसिज दल पर, शवनम् की बूंद एक,
थरथर करता -अस्तित्व हीन।
छलका चाहा -आँखों में आँसू की बूँद एक,
पर प्रेस्टिज था,
क्या करता ? औ कैसे ?
भारत ! तेरी यह गति।
हैं विलख रहे -बच्चे तेरे।
पर , भीतर ही भीतर-
हो ठिठुर-ठिठुर,
आज का ताजा खबर.........
बाबू जी, आ गया- आज का ताजा खबर....।
बाबू जी, आ गया -आज का ताजा खबर......।
बाबू जी , आ गया -आज का ताजा खबर.....।
पड़ी कान में मेरी, फट सा गया हृदय,
आँखें रह गई, पड़ी पथराई सी।
बज रहे सात थे- रात्रि के।
था ठिठुर रहा, जाड़े के भींगीं रातों में,
जैसे सरसिज दल पर, शवनम् की बूंद एक,
थरथर करता -अस्तित्व हीन।
छलका चाहा -आँखों में आँसू की बूँद एक,
पर प्रेस्टिज था,
क्या करता ? औ कैसे ?
भारत ! तेरी यह गति।
हैं विलख रहे -बच्चे तेरे।
पर , भीतर ही भीतर-
हो ठिठुर-ठिठुर,
इन शितलहरी रातों में,
जाड़े के मौसम में।
जाड़े के मौसम में।
राजे रजवाड़े को देखो
तोशक-तकिये औ कोट-पैंट,
नीचे में ऊनी बूट
और स्वेटर के नीचे हैं-तन-मन।
जो मन में चाहा -हाजिर हैं।
बच्चे उनसे हैं खेल रहे-
कृत्रिम नवनीत प्रकाशों में,
जाड़े के मौसम में।
तोशक-तकिये औ कोट-पैंट,
नीचे में ऊनी बूट
और स्वेटर के नीचे हैं-तन-मन।
जो मन में चाहा -हाजिर हैं।
बच्चे उनसे हैं खेल रहे-
कृत्रिम नवनीत प्रकाशों में,
जाड़े के मौसम में।
मनमाने मौसम में।
पढ़ने की इच्छा जागी तो-
एयर हैं, नौकर-चाकर हैं।
शोषण की शिक्षा लेने- शिक्षालय जाते हैं।
पर, यह तो जाड़े की एक रात,
वेवस्त्र, ये तीन रात के भूखे हैं।
आखबार बेच, नित अपना पेट चलाते हैं।
वेबसी निगाहें डाल, सोच कुछ..........
-आगे को बढ़ जाते हैं।
परिवार चार, अवलम्ब एक।
छोटा बच्चा -दस बरसातों को देखा है।
छुट चुकी नौकरी,
विधवा माँ की
-झूठी अफवाही अफवाहों में।
दिलचस्पी लेते हैं- अमीर।
घुटते रहते केवल- गरीब।
आज का ताजा खबर,
आज का ताजा खबर,
आज का ताजा खबर.....।
पढ़ने की इच्छा जागी तो-
एयर हैं, नौकर-चाकर हैं।
शोषण की शिक्षा लेने- शिक्षालय जाते हैं।
पर, यह तो जाड़े की एक रात,
वेवस्त्र, ये तीन रात के भूखे हैं।
आखबार बेच, नित अपना पेट चलाते हैं।
वेबसी निगाहें डाल, सोच कुछ..........
-आगे को बढ़ जाते हैं।
परिवार चार, अवलम्ब एक।
छोटा बच्चा -दस बरसातों को देखा है।
छुट चुकी नौकरी,
विधवा माँ की
-झूठी अफवाही अफवाहों में।
दिलचस्पी लेते हैं- अमीर।
घुटते रहते केवल- गरीब।
आज का ताजा खबर,
आज का ताजा खबर,
आज का ताजा खबर.....।
डॉ० प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज',
S/o स्वर्गीय राजेन्द्र प्रसाद सिंह,
पता :- पचम्बा, बेगूसराय, पिनकोड : 851218, बिहार (भारत)
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