रविवार, 22 अक्टूबर 2017

आज का ताजा खबर .......

आज का ताजा खबर............
आज का ताजा खबर.............
आज का ताजा खबर.............
बाबू जी ! आ गया.............
आज का ताजा खबर..............
बाबू जी ! आ गया..............
आज का ताजा खबर.............

पड़ी कानों में - मेरी ,
फट सा गया- हृदय,
आँखें रह गई-
पड़ी -पथराई सी ।

बज रहे सात थे रात्रि के,
था ठिठुर रहा
जाड़े के भींगीं रातों में
जैसे सरसिज दल पर
शवनम की बून्द एक
थरथर करता- अस्तित्व हीन ।

छलका चाहा, आँखों में आँसू की बू्ँद एक,
पर, प्रेस्टीज था,क्या करता औ कैसे ?
भारत तेरी यह गति ?
हैं विलख रहे बच्चे तेरे ,
पर, भीतर ही भीतर,
हो ठिठुर-ठिठुर,
इन शीतलहरी रातों में,
जाड़े के मौसम में

राजे-रजवाड़े को देखो-
तोशक-तकिया व कोट पैंट,
नीचे में ऊनी बूट और
स्वेटर के नीचे हैं-तन-मन।

पढ़ने की इच्छा जागी तो
-एयर हैं, नौकर-चाकर हैं,
शोषण की शिक्षा लेने
-शिक्षालय जाते हैं ।
गर,मन चाहा,
घर पर शिक्षक बुलवाते हैं ।

पर, यह तो जाड़े की एक रात,
ये तीन रात के भूखे हैं,
अखबार बेच नित,
अपना पेट चलाते हैं ।
बेबसी निगाहें डाल, सोच कुछ,
आगे को बढ़ जाते हैं ।

परिवार चार, अवलम्ब एक,
छोटा बच्चा- दस बरसातों को देखा है ।
छुट चुकी विधवा माँ की,
झूठी अफवाही अपराधों में।
दिलचस्पी लेते हैं अमीर,
घुटते जाते केवल गरीब।,

अखबार बेच वह जीता है
दु:ख को विवेक से जीता है
हँसने खेलने का उमर अभी,
पढ़ने-लिखने की उमर अभी,
करने को जीवन में विकास,
फैलाने दिव्य अन्त: प्रकाश,
गढ़ने जीवन में नया विहान,
पग रखने को हो पायदान।
यह सोच शिशु हो गया विकल,
छलके अविरल , माँ के अश्रु जल।

भाई-बहनों का देख हाल,
चिंता तज सोचा फटेहाल,
सारे जग को समझाना है,
अखबार से पेट चलाना है
संकट से न कभी घबराना है ।
रचनात्मक पथ पर जाना है।

पर, भ्रष्ट ,पतित ,नेता, समाज,
कुख्यात ,दबंग ,आतंकवाद,
स्वार्थी ,अपराधी, हवावाज
छलिये ,अवसरवादी समाज।
कानून बने थे -शासन को,
अन्तरतम् से अनुशासन हो।

पर , सारे बन्धन हम भूल गये
हा समय चक्र प्रतिकूल भये
हर ओर समर है दीख रहा
दुधमंहा विवश हो सीख रहा
'प्राची' को मिटाने को 'पश्चिम'-
तरकीब हमीं से सीख रहा।

वे पाठक से मुझे लड़ाते हैं
क्या लिखें-समझ न पाते हैं।
मेरी ही मेहनत के फल को
अपना वे रोज बताते हैं।

जब समय वोट का आता है
हम सब महान् हो जाते हैं
पैरों में आ झुक जाते हैं
वे दिवास्वप्न दिखलाते हैं।
सब साम, दाम में निपुण नित्य
वे दणड, भेद् बतलाते हैं।

गैरों की तो बातें छोड़ो
अपने अपना बन लूट रहे
दायित्व हीन नर-नारी के
सम्बन्ध सामाजिक छूट रहे।

अखबार आज भी बेच रहा
अखबार की बात सुनाता हूँ।
विज्ञापन के युग में भूले-भटके
सच खबर कहीं पा जाता हूँ।

हैं पत्रकार कुछ बिके हुए
इनकी भी कथा सुनाता हूँ ।
इनका नित सत्य बदलता है,
सच में संसार चलाते हैं।
पाने को सुख, सत्ता-शासन
ये कसर छोड़ नहीं जाते हैं।
जब मन चाहा जिस ओर बहें
उस ओर तुरत बह जाते हैं।

नित रंग बदलते हैं अपना
अपनी औकाद बताते हैं।
सत्ता,समाज, संस्कृति, धर्म की
क्षण में ये नींव हिलाते है।
हम सब की सच्ची झूठी खबरों को
अखबार में जगह दिलाते हैं।
ए.सी.एयर में रहकर ये
हम सब का दर्द सुनाते हैं।

जो रहते इनसे हैं अलग-थलग
वे काफिर इनके कहलाते हैं।
सेवा करते जो निष्ठा से,
वे क्या समाज से पाते हैं ?
मेरे जैसे अखबार बेच
इस दुनिया को तज जाते हैं।
जिस मानवता हित नित मरते हैं
उनका भी साथ न पाते हैं।
लेकिन यथार्थ की जिद में ये
जीवन अमूल्य बिताते हैं।

यश-कीर्ति में विश्वास इन्हें
नित असुरों से ये लड़ते हैं।
संघर्ष समाज में हम करते,
सैनिक सीमा पर मरते हैं।

दिलचस्पी लेते हैं अमीर,
घुटते जाते केवल गरीब।
आज का ताजा खबर।
आज का ताजा खबर।


-प्रो०अवधेश कुमार ' शैलज ', पचम्बा, बेगूसराय।
मेरी पूर्व रचित कविता 'आज का ताजा खबर' का परिवर्धित एवं संशोधित रुप।



रविवार, 24 सितंबर 2017

राष्ट्रकवि फिर जागो !

राष्ट्र कवि ! फिर जागो ।

राष्ट्र कवि!दिनकर !
कैसे मैं श्रद्धा सुमन चढ़ाऊँ ।
अश्रुपूरित आँखों से कैसे आज तुझे हर्षाऊँ।।

भारतेंदु ने सच ही कहा
जो आज समझ में आई ।
"आवहुँ सब मिलि रोवहुँ भारत भाई ।
हा!हा!भारत दुर्दशा देखि न जाई।। "

युग द्रष्टा भारतेंदु नहीं थे
केवल कविता प्रेमी ।
हिन्दी-हिन्दुस्थान भारत के
अन्तरतम से थे  सेवी ।।

राजनीति व्याध साहित्यिक
छल बल से भरे हुए हैं ।
स्वार्थी,अपराधी, आराजक
तत्वों से हम घिरे हुए हैं ।।

अवसरवादी, शरणागत हो,
माथे पर चढ़े हुए हैं ।
मानवता त्रसित हो रही,
आतंकित सारी धरती है ।।

धर्म-कर्म हो रहे तिरोहित,
दुष्ट भाव फैला है ।
देश द्रोहियों का भारत में
महाजाल फैला है ।।

विश्व गुरु भारत की कुटिया,
लूट रहे जग वाले ।
पोथी-पतरा सभी ले गए,
जो बचा जला वे डाले ।।

तप, कर्म, संकल्प, साधना,
ईश बल बचा हुआ है ।
गीता का उपदेश कृष्ण का,
अब भी गूँज रहा है ।।

अर्धनारीश्वर रुप हमारा,
इसे तोड़ते जो हैं ।
प्रकृति-पुरुष की दिव्य शक्ति
को नहीं जानते वे है ?

एक सनातन धर्म हमारा,
सब जीवों की सेवा है ।
दया धर्म का मूल हमारा,
क्षणभर मेरा तेरा है ।।

हम अगुण सगुण को भजते,
सबको अपना ही समझते हैं ।
वे दया धर्म से पतित हमें,
कायर काफिर तक कहते हैं ।।

हम शान्ति, न्याय, आदर्श, अहिंसा,
सत् पथ पर चलते हैं ।
वे ज्योति बुझा कर हमें कुमार्ग
पथ पर चलने को कहते हैं ।।

तोड़ रहे सांस्कृतिक एकता,
आपस में हमें लड़ाकर ।
पूर्वाग्रह ग्रसित प्रतिशोध की
ज्वाला को भड़का कर ।।

जाति-धर्म की राजनीति
हरदम करते रहते हैं ।
ऊँच-नीच का पाठ पढ़ा कर
ये हमको ठगते हैं ।।

" कुपथ-कुपथ जो रथ दौड़ाता,
पथ निर्देशक वह है ।
लाज लजाती जिसकी कृति से,
धृत उपदेशक वह है ।।"

भटक रहे जो खुद भ्रमित हो,
औरों को राह दिखाते हैं ।
नद निर्झर की धारा को वे
शिखरों की ओर बहाते हैं ।।

आर्ष ज्ञान से भटका कर
पाश्चात्य जगत ले जाते हैं ।
आधुनिक विज्ञान ज्ञान से,
वे हमको भरमाते हैं ।।

" सोने की चिड़ियाँ " का इसने
अद्भुत रुप नहीं देखा है ।
वरदा भारत भारती माँ से
वेकार उलझ बैठा है ।।

रण चण्डी को बुला रहा है,
रोज निमन्त्रण देकर ।
भगवा धारी प्रकट हुई हैं,
आज तिरंगा लेकर ।।

राष्ट्रकवि! इनके वन्दन का,
समय पुनः आया है ।
जागें बन मुचुकुन्द कविवर,
राक्षसी प्रवृत्ति छाया हैं ।।

भस्म करें निज ज्ञान नेत्र से,
अन्तर के असुर दलों को ।
अमृत का उपहार सुरों को,
दें फिर मोहिनी बन के ।।

काल कूट तू ही पी सकते,
औरों में शौर्य कहाँ है ?
रहते शांत, असीम धैर्य की
शक्ति यहाँ कहाँ है ?

कविवर ! उठो,जगो हे दिनकर !
तम को दूर भगाओ ।
श्रम जीवी, बुद्धि जीवी को,
सत् पथ राह दिखाओ ।।

बाट जोहती खड़ी भारती
कब से हिन्द जन मन में ।
देर हो रही रणचंडी के,
पावन अभिनन्दन में ।।

" हिन्द उन्नायक " खोज रही हैं,
कब से भारत माता ।
वरण करो रचनात्मकता का,
अवसर न हरदम आता ।।

अपने और पराये अर्जुन,
इन्हें अभी पहचानो ।
अन्तस्थल के विराट को,
दिव्य-दृष्टि से जानो ।।

माता रही पुकार राष्ट्रकवि !
जागो और जगाओ ।
भूषण, गुप्त, सुभद्रा, प्रसाद को
फिर से आज जगाओ ।।

विखरे अपने अंगों को
आज पुनः अपनाओ ।
सत्तर वर्षों की निद्रा से,
वीरों को पुनः जगाओ ।।

भारत की सभ्यता-संस्कृतिक,
संकट में पड़ी हुई है ।
रक्त बीज,जय चन्द, शकुनि से
धरती भरी हुई है ।।

अर्जुन को ही नहीं युधिष्ठिर को
भी रण में लड़ना होगा ।
पाने को अधिकार विवेक से
कर्त्तव्य पूर्ण करना होगा ।।

रण में जो आड़े आयेंगें,
उनको हम सबक सिखायेंगे ।
हम विदुर और चाणक्य सूत्र से
सारे जग को हम जीतेगे ।।

"शैलज" मिथिला की सीमा पर
" दिनकर " की सिमरिया नगरी है ।
हिन्दी साहित्य भाषा शैली की
अवशेष अशेष यह गगरी है ।।

इस पुण्य भूमि को नमस्कार
जिसने तुम-सा सुत जन्म दिया ।
भारत माता की सेवा में निष्ठा से
जीवन भर अपना कर्म किया ।।

देव- दनुज हेतु जहाँ अमृत प्रकटे,
प्राकृत संस्कृत वेद वचन प्रभु से निकले ।
रुप मोहिनी,हरि,राम,विष्णु आये,
सुरसरि हित अवतरित हुए प्रभु रुक पाये ।।

कविवर जागो! हे राष्ट्र कवि !
दिनकर ! तू आँखें खोलो ।
गंगा जल से आँखें धोलो ।
पावन 'रेणु' का 'मैला आँचल' धोलो ।।

प्रगतिशील कहलाने वाले
सोच नहीं कुछ पाते ।
माँ की ममता समझ न पाते,
मुझको ही हैं समझाते।।

हे राष्ट्रकवि! दिनकर ! कवि वर !
जन गण मन बोल रहा है ।
जन्म दिवस पर आज तुम्हें ये
अन्तस् की पीड़ा बता रहे हैं ।।

राष्ट्र कवि! दिनकर !
कैसे मैं श्रद्धा सुमन चढ़ाऊँ ?
राष्ट्र धर्म हो नहीं कलंकित
ऐसा राष्ट्र बनाऊँ ।
एक राष्ट्र ही नहीं विश्व में
यह परचम लहराऊँ ।।
भारत माता की सेवा में
जीवन शेष बिताऊँ ।
जनता की सच्ची सेवा कर
जन सेवक कहलाऊँ ।।
मांग रहा बलिदान राष्ट्र जब
कभी नहीं घबराऊँ ।
ज्ञान- विज्ञान, कला ,अध्यात्म
का जग को पाठ पढ़ाऊँ ।
अहंकार में भटके जन को
कैसे राह दिखाऊँ ?

राष्ट्र कवि! दिनकर !
कैसे मैं श्रद्धा सुमन चढाऊँ ?
अश्रुपूरित नेत्र, हृदय की पीड़ा को
कैसे तुझे बताऊँ ?
पीड़ित मन न से कैसे मैं
आज तुझे हर्षाऊँ ?

प्रो० अवधेश कुमार " शैलज "‛
पचम्बा, बेगूसराय ।

शनिवार, 11 मार्च 2017

शैलज काव्य कोश

शैलज काव्य कोश नामक पेज में तथा Awadhesh Kumar नाम से फेस बुक में भी मेरी कविताएँ आपको पढ़ने या अवलोकनार्थ इस ब्लाग के अतिरिक्त मिलेगी।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

सर्व कल्याणकारी प्रार्थना

प्रार्थना :- ' सर्व कल्याणकारी प्रार्थना '
                          -  प्रो० अवधेश कुमार शैलज,                                              पचम्बा, बेगूसराय
                               
प्रियतम स्वामी सुन्दरतम्, माधव! हे सखा हमारे ।
मिलती है शान्ति जगत में केवल प्रभु तेरे सहारे ।
तुम अमल धवल ज्योति हो, ज्योतित करते हो जग को ।
 स्रष्टा, पालक, संहर्ता तम एक नियन्ता जग के ।
कैसे मैं तुझे पुकारूँ जड़ हूँ, न ज्ञान मुझको है ।
प्रभु एक सहारा तुम हो, रखनी प्रभु लाज तुझे है ।
सर्वग्य ,सम्प्रभु माधव, तुम तो त्रिकाल दर्शी हो ।
अन्तर्यामी जगदीश्वर,तमहर,भास्कर भास्कर हो।
मायापति, जन सुखदायक, तुम व्याप्त चराचर में हो।
हे अगुण, सगुण परमेश्वर, सर्वस्व हमारे तुम हो ।
आनन्दकन्द, करूणाकर , शशि-सूर्य नेत्र हैं तेरे ।
तुम बसो अहर्निश प्रतिपल प्रभु अभ्यन्तर में मेरे ।
तेरी ही दया कृपा से अन्न धन सर्वस्व मिला है ।
तेरी ममता इच्छा से यह जीवन कमल खिला है ।
उपहास किया कर ते हैं जग के प्राणी सब मेरे ।
स्वीकार उन्हें करता हूँ , प्रेरणा मान सब तेरे ।
कर्त्तव्य किया न कभी मैं,प्रभु प्रबल पाप धोने का ।
जुट पाता नहीं मनोबल , प्रभु अहंकार खोने का ।
बस, तिरस्कार पाता हूँ,यह पुरस्कार है- जग का ।
है बोध न मुझको कुछ भी, जगती का और नियति का ।
यह जीवन चले शतायु, मंगलमय हो जग सारा ।
माधव ! चरणों में तेरे, जीवन अर्पित हो सारा ।
हे हरि ! दयानिधि, दिनकर, सब जग के तुम्हीं सहारे ।
हम सब को प्रेम सिखाओ, हे प्रेमी परम हमारे ।
हो बोध हमें जीवन का, कर्त्तव्य बोध हो सारा ।
अनुकरण योग्य प्रति पल हो, जीवन आदर्श हमारा ।
सार्थक हो जग में जीवन, सार्थक हो प्रेम हमारा ।
माधव चरणों में तेरे, जीवन अर्पित हो सारा ।
:- प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय ।






                                         



























                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             


















                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             






                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

मानसरोवर...................।

मानसरोवर बीच में हंसा कितना सुन्दर सोहै।
का कहुँ ? सखि ! मेरो चितवन को, आजु पुनि पुनि मोहै।
हंसा तैरे मानसरोवर , जल चंचलता छोडै
मानसरोवर.......................................................।
आठ चलै, पुनि चार चलै, द्वादश, षोडश होई निकसै।
का कहूँ ? पर, एक बीस जित तित मग होई बिकसै।
मानसरोवर................................................।
चलै समीर, अग्नि, धरा, जल या नभ में ठहरावै।
श्याम, अरुण, पीताभ, श्वेत औ नील गगन दिखलावै।
मानसरोवर.................................................।
वायु वृत्त, तेज त्रिभुजवत्, धरा चतुर्भुज भावै।
आपु बूँद सम फैले नीचे, नभ अण्डाकृति सा लागै।
मानसरोवर....................................................।
अम्ल, तीक्ष्ण, मधु, धात्री, कटुवत् स्वाद तत्व बतावै।
नाभि, स्कन्ध, जानु, पद, मस्तक पर क्रमश: तत्व
विराजै।
मानसरोवर......................................................।
तिर्यक, ऊपर, समतल, नीचे, द्विस्वर व्योम बतावै।
यंरंलंवंहं बीज ध्यान परम सुख निश्चय मार्ग दिखावै।
मानसरोवर.......................................................।
उच्चाटन मारण शान्ति कर स्तम्भन मार्ग बतावै।
मध्यम् मार्ग व्योम कर निश्चय,कर्म निषेध बतावै।
मानसरोवर.......................................................।
अन्तक, क्रूर, चर, स्थिर योगादि तत्व सुख बाँटे।
हानि-हानि औ लाभ-लाभ का फल, निष्फल न कहावै।
मानसरोवर.........................................................।
ईड़ा चन्द्र सौम्य सोम बामांगी, निशि दिन रास रचावै।
कठिन क्रूर संघर्ष शौर्य रवि दिन पति पिंगल कृष्ण कहावै।
मानसरोवर.................................................।
ईंगला-पिंगला साथ सुषुम्ना ईस्वर ध्यान लगावै।
ऐसौ करै सदा सुख पावै, बर्ह्मलीन होई जावै।
मानसरोवर........................................................।
दशरथ निज का मोह छाड़ि जब राम का ध्यान लगावै।
का कहुँ ? सखि ! हंसा तेहि क्षण में सो अहं सो मिलि जावै।
मानसरोवर......................................................।
:- प्रो०अवधेश कुमार 'शैलज',पचम्बा,बेगूसराय।

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

'कलियुग' :-प्रो०अवधेश कुमार 'शैलज'

'कलियुग' :-

चिन्मय सत्ता मानव की सृष्टि से,
विश्व की रचना कर
अपनी अभिव्यक्ति से-
देश-काल-पात्र की सृष्टि करती है।
यह सब कुछ जो अगोचर है
या कि दृष्टगोचर है - अनन्त है।
इसका न आदि है और न अन्त है।
मानव समय को आदि अन्त की सीमा में-
बाँधना चाहता है, सीमांकन करता है ।
मानव की कल्पना- समय की त्रुटि से..
....वर्षों, युगों और कल्पों में जाती है।
फिर भी समय की सीमा मिल नहीं पाती है।
क्योंकि समय सीमा रहित भूत, वर्त्तमान् औ भविष्य है ।
समय वास्तव में- हर समय वर्तमान् है।
यह न भूत है और न भविष्य है।
आर्ष ग्रन्थों ने, आर्यों ने, गहन चिन्तकों ने,
वेदों, पुराणों, उपनिषदों, ग्रन्थों में......
स्रष्टा की वाणी को- श्रुति एवं स्मृति से.....
लिपि देवनागरी में, सुसंस्कृत भाषा में.....
बोध को, बुद्धत्व को- पिरोया सजाया है।
समय के महत्व को- तत्व के चिन्तन से-
करके समृद्ध - सारे जग को बताया है।
सतयुग से कलियुग तक, बोध से विज्ञान तक
अनुभूति से प्रयोग तक- मार्ग दिखलाया है।

:- प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय।


सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

सोचता हूँ

'सोचता हूँ' :-
क्या कहा ?
बाबू जी ! भूखा हूँ .....नंगा......हूँ।
क्या कहूँ ? बाबू जी- पूरा भिखमंगा हूँ।
हटो.......-रास्ते से ,
नहीं तो लूँँगा - डंडे से खबर.....।
बाबू जी.....!  जाड़े का मारा हूँ.....।
क्या कहूँ ? बाबू जी.........।
पूरा वेचारा हूँ।....बाबू जी.....।
हटाओ इसे......।
वक्त खाता जाता है।
व्यर्थ वकवास में मुझे यह फँसाता है......।
बाबू जी ! पाले से पड़ा पाला है ।
आप मेरा रखवाला हैं।
हटेगा नहीं यह ।
मार दो धक्का इसे ।
चढ़ा दो चक्का- सीने पर।
यह तो- बाबू जी का- साला है।
आह ! बाबू जी ! अच्छा किया आपने - छुटकारा दिला दिया  मुझे विपदाओं  के इस चक्कर से ।
जन्म-जन्मान्तर से ।
सोचा था, वास्ते आपके झेलूँगा -सब कुछ, पर, तुम पर न ढ़लने दूँगा-सितम ।
आह बाबू जी ! आह बाबू जी ।
अब तो चला- अहले सितम ।
आह बाबू जी !आह बाबू जी !
एक चींख निकली !
गुजर गयी- कार ।
फैली चारों तरफ- गर्द वेशुमार ।
रह गई, मेरे कानों में, गूँज एक- बाबू जी ।
सभा से लौटते वक्त......।
लम्बी सड़क पर..... कार की लाईट में ।
देखा सियार को- जूझते...... उसी बुडढ़े की लाश पर।
पर, उस समय कहाँ मुझे अवकाश था ।
दूसरे ही दिन, अखवारों में पढ़ा.......
वह और कोई नहीं- मेरा ही- बूढ़ा बाप था ।
सोचता हूँ.......... यह तो अनर्थ है कि मैं ही अपने बाप का हत्यारा हूँ ।
अत: क्यों न पत्रकारों को कोई नया ईशारा दूँ।
:- प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय।

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

अन्तर्यामी


अन्तर्यामी !
 दिव्य चेतना का हमको नित बोध रहे।
सत्य सनातन धर्म ज्ञान का फैला अन्तर्बोध रहे।
हूँ, मैं कौन ? कहाँ से आया ?
किससे चालित होता हूँ  ?
बोध हमें हो, क्यों हम जीते ?
किस चिर निद्रा में सोते हैं ?
किस विकास का क्रमिक बोध ले,
हम धरती पर आते हैं ?
अन्तर्यामी !
दिव्य चेतना हमको नित बोध रहे ।
सत्य सनातन धर्म बोध का फैला अन्तर्बोध रहे।
:- प्रो०अवधेश कुमार' 'शैलज',पचम्बा,बेगूसराय।

राष्ट्र-गान

राष्ट्र-गान :-




ट्विटर

ट्विटर
 

परिणय -सूत्र

परिणय सूत्र :-
पावन परिणय बन्धन में , जो प्राणी बँध जाते हैं।
संसार सुखों से भरकर, मंगलमय हो जाते हैं।।
ऋषि-मुनि मोक्ष के सुख में, अपने को खोते हैं।
दम्पति परिणय में ही तो, सम्पूर्ण मोक्ष पाते हैं।।
:-प्रो०अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय।

हिमशैल शैलश्रृंग :-


वह कौन ?
अरे, हिम शैल  श्रृंग।
अव्यय, अव्यर्थ, अवर्ण्य श्रृंग।
अवढ़र, अमेय, अविकार श्रृंग।
अविकल, अशेष, अविकल्प श्रृंग।
सुषमा मंडित निरपेक्ष श्रृंग।
वह कौन ?
अरे, हिम शैल श्रृंग ।(क्रमश:)
:- प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज ', पचम्बा, बेगूसराय।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

घोड़ा -गाड़ी

'घोड़ा-गाड़ी' :-
घोड़ा-गाड़ी एक सवारी,
घोड़ा-गाड़ी एक सवारी।
सोचो मत, आई रथ की बारी
घोड़ा-गाड़ी एक सवारी।
टक-टक, टिक-टिक,
टक-टक,टिक-टिक,
चली जा रही घोड़ा गाड़ी,
घोड़ा-गाड़ी एक सवारी।
कच्ची-पक्की ऊवड़-खावड़
गली-कूँची, मैदान-सड़क पर
डग-मग, डग-मग हिंडोले-से ,
पैसेन्जर को झुमा-झुमा कर,
चली जा रही घोड़ा-गाड़ी,
घोड़ा-गाड़ी एक सवारी।
टक-टक, टिक-टिक,
टक-टक, टिक-टिक,
चली आ रही घोड़ा-गाड़ी
घोड़ा-गाड़ी एक सवारी।
आ जा भैया, बाबा आ जा,
मैया और बहिनियाँ आ जा,
नानी,दादी,वीवी आ जा,
एक सवारी खाली आ जा,
चाचा और भतीजा आ जा,
बकरी वाली दीदी आ जा,
टोकरी वाली चाची हट जा,
मामू आगे में तू डट जा,
बौआ थोड़ा और ठहर जा,
दादा साहेब को जाने दें,
नेता जी को भी आने दे,
एक पसिंजर और है खाली
साले कर पीछे रखवाली
घोड़ा-गाड़ी चल मतवाली,
एक्सप्रेस की मोशन वाली
घोड़ा-गाड़ी चल मतवाली
घोड़ा-गाड़ी एक सवारी।
चना चबाते सईस जा रहा,
चाबुक खा-खा घोड़ा,
यहाँ ठहर , बहाँँ चल बाबू,
चलना है बस थोड़ा।
घोड़ा गाड़ी खींच रहा है,
आगे जो कुछ दीख रहा है।
घोड़ा गाड़ी खींच रहा है।
जनता पिसा रही वेचारी,
इसकी भी है हद लाचारी,
एक-दूसरे के कंधे पर -
लदी हुई है जनता सारी।
घोड़ा-गाड़ी एक सवारी।
यहीं दीखती दुनियाँ दारी,
ढींग मारते गप्पी भैया,
बहस कर रही चाची,
रजनीति करते नेताजी,
दादा करते -रंगदारी।
इसी बीच में अटका घोड़ा,
लगा सभी को झटका,
कोई गिरा, खड़ा हो भागा,
कोई तांगे से लटका।
भूखा-प्यासा, जर्जर घोड़ा,
थककर रूका वेचारा,
किन्तु, वेरहम ने उसका खाल उघाड़ा।
लोगों ने कितना समझाया,
सईस कहाँ से माने ?
मेरा घोड़ा, मर्जी मेरी,
चले मुझे- समझाने।
फेरा हाथ पीठ पर उसके,
बाबू मेरे प्यारे-भैया,
मेरे राज दुलारे,
चलो-चलो शाबास बहादुर,
मोटर को आज पछाड़ें।
सुनकर बोली चिकनी-चुपड़ी,
घोड़ा सरपट दौड़ा।
रूका नहीं वह कहीं मार्ग में,
लेकर गाड़ी घोड़ा।
चना चबाते सईस जा रहा,
चाबुक खा-खा घोड़ा।
घोर कष्ट में भी घोड़े ने,
कभी नहीं मुँह मोड़ा।
तांगेवाला दिया ईशारा,
रोका औ पुचकारा,
कर वसूलने लगा सईस,
सुविधा को किया किनारा।
जैसे-तैसे लादा सबको,
जन-जन को समझाया,
जिसने कष्ट किया जीवन में,
वही लक्ष्य को पाया।
देखो, घोड़ा खींच रहा है,
घोड़ा गाड़ी खींच रहा है,
आगे जो कुछ दीख रहा है,
घोड़ा गाड़ी खींच रहा है।
:- प्रो० अवधेश कुमार'शैलज',पचम्बा,बेगूसराय।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

भिक्षुक

'भिक्षुक' :-
बस, आज अभी की बात,
पकड़िया के नीचे बैठा था-
नर-कंकाल एक -दुपहरिया की जलती छाया में।
मत कहो इन्हें -भिक्षुक।
ये वेचारे हैं- निर्ममता के मारे हैं।
फँसा दिया है, इनको -समाजवालों ने।
झूठी-अफवाही जालों में।
लूट ली सारी जमीन।
अब,पग रखने को जगह नहीं है।
ये हैं समाजवाले- दलाल, शोषक औ मक्कार।
अपने को कहते- समाजवादी।
ले लिया- जगह, न काम दिया,
न पारिश्रमिक औ न आराम दिया।
सब लिया औ बदले में क्या दिया- सुने.......
बेबसी, अमित व्यथा औ .............
.......अन्ततः -दो मुट्ठी दाने, दो गज वस्त्र हेतु -सदा के लिए भिक्षुक बना दिया........।
:- प्रो०अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय।

आज का ताजा खबर...(संशोधित) :-

आज का ताजा खबर... :-

'आज का ताजा खबर'
आज का ताजा खबर.........
बाबू जी, आ गया- आज का ताजा खबर....।
बाबू जी, आ गया -आज का ताजा खबर......।
बाबू जी , आ गया -आज का ताजा खबर.....।
पड़ी कान में मेरी, फट सा गया हृदय,
आँखें रह गई, पड़ी पथराई सी।
बज रहे सात थे- रात्रि के।
था ठिठुर रहा, जाड़े के भींगीं रातों में,
जैसे सरसिज दल पर, शवनम् की बूंद एक, 
थरथर करता -अस्तित्व हीन।
छलका चाहा -आँखों में आँसू की बूँद एक,
पर प्रेस्टिज था,
क्या करता ? औ कैसे ?
भारत ! तेरी यह गति।
हैं विलख रहे -बच्चे तेरे।
पर , भीतर ही भीतर-
हो ठिठुर-ठिठुर,
इन शितलहरी  रातों में, 
जाड़े के मौसम में।
राजे रजवाड़े को देखो
तोशक-तकिये औ कोट-पैंट, 
नीचे में ऊनी बूट
और स्वेटर के नीचे हैं-तन-मन।
जो मन में चाहा -हाजिर हैं।
बच्चे उनसे हैं खेल रहे-
कृत्रिम नवनीत प्रकाशों में,
जाड़े के मौसम में।
मनमाने मौसम में। 
पढ़ने की इच्छा जागी तो-
एयर हैं, नौकर-चाकर हैं।
शोषण की शिक्षा लेने- शिक्षालय जाते हैं।
पर, यह तो जाड़े की एक रात, 
वेवस्त्र, ये तीन रात के भूखे हैं।
आखबार बेच, नित अपना पेट चलाते हैं।
वेबसी निगाहें डाल, सोच कुछ..........
-आगे को बढ़ जाते हैं।
परिवार चार, अवलम्ब एक।
छोटा बच्चा -दस बरसातों को देखा है।
छुट चुकी नौकरी,
विधवा माँ की
-झूठी अफवाही अफवाहों में।
दिलचस्पी लेते हैं- अमीर।
घुटते रहते केवल- गरीब।
आज का ताजा खबर,
आज का ताजा खबर,
आज का ताजा खबर.....।

 डॉ० प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', 
S/o स्वर्गीय राजेन्द्र प्रसाद सिंह, 
पता :- पचम्बा, बेगूसराय, पिनकोड : 851218, बिहार (भारत) 




कबीर कहते हैं

 कबीर कहते हैं:- गुरू वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी सोच के  लगन धरी,  करम गति टारे नाहि टरे।............
वर्षों पूर्व विद्यार्थी  जीवन में ही एक दिन जब मैं 'कबीर दास जी' की उक्त दोहे का अध्ययन कर रहा था, उसी समय महान् कवि एवं संत कबीर दास जी की इन पंक्तियों  ने मुझे चिन्तन हेतु प्रेरित किया और मानस पटल पर अधोलिखित पंक्तियों का सहज ही आविर्भाव हुआ, जिसे आप सबों की सेवा में प्रस्तुत किया जा रहा है:-
" जो नर भव बन्धन से निज को निशि-दिन दूर करे। करम गति उनकी सहज टरे।"
 :- प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय।
"करे करम प्रकृति-पुरुष भाव से, 
शैलज शुचि धरम धरे। 
करम गति सदा साथ चले। 
जो नर भव बन्धन से निज को, 
निशि-दिन दूर करे। 
करम गति उनकी सहज टरे।"


'हर हृदय में कवि हैं-वेपर्द सोये' : - डॉ० प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', उर्फ 'कवि जी' ,पचम्बा, बेगूसराय।

हर हृदय मेंं कवि हैं - वेपर्द सोये।
स्नेह से सिंचित जगत को,
प्रेममय अवदान देने
-मार्ग का व्यवधान हरने,
कुसुम कलियों को खिलाने ;
दलित,पीड़ित औ बुभुक्षित ;
-प्राणियों की पीड़ हरने ;
कलह, कुंठा, आत्मपीड़न;
भयादोहन, आतंक, शोषण;
औ बाहुबल का दम्भ हरने;
तंत्र-मंत्र औ यंत्र शक्ति को
- सम्यक् सन्मार्ग देने ;
विविध रचनात्मक कदम का
सहज दिव्य संकल्प लेकर;
चराचर के हितों में
मानवता को स्वस्थ करने ;
लोक हेतु स्वयं को करके समर्पित
- स्वप्न को चिरकाल से संजोकर
जोहते हैं बाट - अवसर की,
सम्यक् कर्म की समुचित घड़ी की;
दीखते है नींद में, पर भ्रम यही है-
हर हृदय में कवि हैं- वेपर्द सोये ,
किन्तु भ्रम केवल हमारा -
जो जगे को कब से सोया मानते हैं।
 :- डॉ० प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज' ,
       पचम्बा, बेगूसराय।



कविता :-

"कविता या काव्य मानव के अन्त:स्थल में प्रसुप्तावस्था में पुष्पित , पल्लवित एवं विकसित हो रही वह चैतन्यता है, जो अपनी प्राकृतिक एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति हेतु प्राय: भाषा और साहित्य के वैयाकरणिक प्रतिबन्धों तथा अनुशासनिक मानदण्डों को अंगीकार करते हुए भाव प्रवाह की अविरल धारा  का आनन्द लेते हुए अन्तः उद्भूत सहज प्रेरणा के स्नेहिल स्पर्श एवं अवचेतनता के स्वप्निल आनन्द के साथ चराचर को संगीतमयता या लयबद्धता में सराबोर करने की मानसिकता के साथ अपनी अचेतनता में व्याप्त अवगुंठन को सुलझाने के प्रयास एवं अपने आप को समाज में प्रतिष्ठापित करने की प्रतिबद्धता के साथ ही अपनी प्राकृतिक रचनात्मकता की स्वाभाविक ,लिपिबद्ध या गेय रचनात्मक अभिव्यक्ति है।"

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार  'शैलज', (प्राचार्य सह विभागाध्यक्ष मनोविज्ञान, मधैपुरा जवाहर ज्योति महाविद्यालय, ममारकपुर, बनवारीपुर, बेगूसराय, कालेज कोड :८४०१४),
पता:- पचम्बा, बेगूसराय (851218). 

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

आँसू

आँसू:-
रूक-रुक क्यों ? 😢 तू ढ़लकता ?
बहता जा तू अविरल रे।
अविराम अनन्त सुख दु:ख में,
मिटता जा घुल 'शैलज' कण में।
अरूणाभ कपोलों से गिर-गिर रे,
टूटे न हृदय औ मन रे।
इसलिए, सुनो ! मेरे सुन्दरतम्।
बहता जा तू अविरल रे।
:- प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज',पचम्बा, बेगूसराय।

दिवा-निशा मिलन: प्रो०अवधेश कुमार 'शैलज',

भोर  के रथ पर चढ़कर, निशा बैठी सिमटकर।
संग में तारक को भी, आँचल से सम्भाला।।
 - प्रो०अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा,बेगूसराय।

सांसारिक प्रेम :-

'शैलज' भेंटे प्रेम जो , मत मन राखू गोय।
अनुपयोगी कूप जल , ज्यो विषाक्त ही होय।।

Light

Light :-
Light in general absence of darkness,
but light in real to recognize darkness.
:- -Prof. Awadhesh kumar 'SHAILAJ'

सरस्वती वंदना

सरस्वती वन्दना:-
सर्वं त्वेष त्वदीयं माँ,  नमस्तुभ्यम् भारती।।
ऊँ गल ग्रह नाशिनी, गहन तथ्य प्रकाशिनी।
गन्धर्व, वेद, घनाक्षरी प्रिया,गान्धार स्वरानुमोदिनी।।
गुण गण गीति प्रदायिनी, गुप्त रत्न दायिनी।
गुप्त तथ्य प्रकाशिनी, प्रज्ञा चक्षु प्रदायिनी।।
गो,गिरा,ग्राम,स्वामिनी, गति-मति प्रदायिनी।
सर्वं त्वेष् त्वदीयं माँ ,नमस्तुभ्यम् भारती।।
अज-जाया, जिगीषा प्रदायिनी;
जुगुप्सा,अज्ञान विनाशिनी।
तदाकार, तदगुण, तद्धित मह,
तन्मात्री तमोगुण नाशिनी।।
तपत्रय, तारक, तालव्य तारिका,
तुक, तुकान्त, तुरीय, तुष्टि,तुहिन कारिणी।
सर्वं त्वेष् त्वदीयं माँ ,नमस्तुभ्यम् भारती।।
दनुज, दस्यु, दंभिक दर्प विनाशिनी।
दीक्षा-गुरु, दीनबन्धु, दु:ख नाशिनी।।
सर्वं त्वेष् त्वदीयं माँ, नमस्तुभ्यम् भारती।।
      (क्रमश:)
:- प्रो०अवधेश कुमार 'शैलज',
पचम्बा, बेगूसराय।

Congratulations:-

Congratulations to social media related persons, readers, writers, creative thinkers, editors & social workers.

My surname 'Shailaj' is based on my mother's name 'Shail Kumari'.

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It is my new blogspot.com:- -Prof. Awadhesh kumar Principal & H.O.D.Psychology)

It is my new blogspot.com because 'Shailaj' is my surname. Reading, writing (poems also), editing, distance healing, journalism, research work, lecture, homoeopathy, spiritual healing, social work & creative thinking is my hobby.:- Prof. Awadhesh kumar (Principal & H.O.D.Psy., M.J.J.College,M., Banwaripur,Begusarai).