रविवार, 22 अक्टूबर 2017

आज का ताजा खबर .......

आज का ताजा खबर............
आज का ताजा खबर.............
आज का ताजा खबर.............
बाबू जी ! आ गया.............
आज का ताजा खबर..............
बाबू जी ! आ गया..............
आज का ताजा खबर.............

पड़ी कानों में - मेरी ,
फट सा गया- हृदय,
आँखें रह गई-
पड़ी -पथराई सी ।

बज रहे सात थे रात्रि के,
था ठिठुर रहा
जाड़े के भींगीं रातों में
जैसे सरसिज दल पर
शवनम की बून्द एक
थरथर करता- अस्तित्व हीन ।

छलका चाहा, आँखों में आँसू की बू्ँद एक,
पर, प्रेस्टीज था,क्या करता औ कैसे ?
भारत तेरी यह गति ?
हैं विलख रहे बच्चे तेरे ,
पर, भीतर ही भीतर,
हो ठिठुर-ठिठुर,
इन शीतलहरी रातों में,
जाड़े के मौसम में

राजे-रजवाड़े को देखो-
तोशक-तकिया व कोट पैंट,
नीचे में ऊनी बूट और
स्वेटर के नीचे हैं-तन-मन।

पढ़ने की इच्छा जागी तो
-एयर हैं, नौकर-चाकर हैं,
शोषण की शिक्षा लेने
-शिक्षालय जाते हैं ।
गर,मन चाहा,
घर पर शिक्षक बुलवाते हैं ।

पर, यह तो जाड़े की एक रात,
ये तीन रात के भूखे हैं,
अखबार बेच नित,
अपना पेट चलाते हैं ।
बेबसी निगाहें डाल, सोच कुछ,
आगे को बढ़ जाते हैं ।

परिवार चार, अवलम्ब एक,
छोटा बच्चा- दस बरसातों को देखा है ।
छुट चुकी विधवा माँ की,
झूठी अफवाही अपराधों में।
दिलचस्पी लेते हैं अमीर,
घुटते जाते केवल गरीब।,

अखबार बेच वह जीता है
दु:ख को विवेक से जीता है
हँसने खेलने का उमर अभी,
पढ़ने-लिखने की उमर अभी,
करने को जीवन में विकास,
फैलाने दिव्य अन्त: प्रकाश,
गढ़ने जीवन में नया विहान,
पग रखने को हो पायदान।
यह सोच शिशु हो गया विकल,
छलके अविरल , माँ के अश्रु जल।

भाई-बहनों का देख हाल,
चिंता तज सोचा फटेहाल,
सारे जग को समझाना है,
अखबार से पेट चलाना है
संकट से न कभी घबराना है ।
रचनात्मक पथ पर जाना है।

पर, भ्रष्ट ,पतित ,नेता, समाज,
कुख्यात ,दबंग ,आतंकवाद,
स्वार्थी ,अपराधी, हवावाज
छलिये ,अवसरवादी समाज।
कानून बने थे -शासन को,
अन्तरतम् से अनुशासन हो।

पर , सारे बन्धन हम भूल गये
हा समय चक्र प्रतिकूल भये
हर ओर समर है दीख रहा
दुधमंहा विवश हो सीख रहा
'प्राची' को मिटाने को 'पश्चिम'-
तरकीब हमीं से सीख रहा।

वे पाठक से मुझे लड़ाते हैं
क्या लिखें-समझ न पाते हैं।
मेरी ही मेहनत के फल को
अपना वे रोज बताते हैं।

जब समय वोट का आता है
हम सब महान् हो जाते हैं
पैरों में आ झुक जाते हैं
वे दिवास्वप्न दिखलाते हैं।
सब साम, दाम में निपुण नित्य
वे दणड, भेद् बतलाते हैं।

गैरों की तो बातें छोड़ो
अपने अपना बन लूट रहे
दायित्व हीन नर-नारी के
सम्बन्ध सामाजिक छूट रहे।

अखबार आज भी बेच रहा
अखबार की बात सुनाता हूँ।
विज्ञापन के युग में भूले-भटके
सच खबर कहीं पा जाता हूँ।

हैं पत्रकार कुछ बिके हुए
इनकी भी कथा सुनाता हूँ ।
इनका नित सत्य बदलता है,
सच में संसार चलाते हैं।
पाने को सुख, सत्ता-शासन
ये कसर छोड़ नहीं जाते हैं।
जब मन चाहा जिस ओर बहें
उस ओर तुरत बह जाते हैं।

नित रंग बदलते हैं अपना
अपनी औकाद बताते हैं।
सत्ता,समाज, संस्कृति, धर्म की
क्षण में ये नींव हिलाते है।
हम सब की सच्ची झूठी खबरों को
अखबार में जगह दिलाते हैं।
ए.सी.एयर में रहकर ये
हम सब का दर्द सुनाते हैं।

जो रहते इनसे हैं अलग-थलग
वे काफिर इनके कहलाते हैं।
सेवा करते जो निष्ठा से,
वे क्या समाज से पाते हैं ?
मेरे जैसे अखबार बेच
इस दुनिया को तज जाते हैं।
जिस मानवता हित नित मरते हैं
उनका भी साथ न पाते हैं।
लेकिन यथार्थ की जिद में ये
जीवन अमूल्य बिताते हैं।

यश-कीर्ति में विश्वास इन्हें
नित असुरों से ये लड़ते हैं।
संघर्ष समाज में हम करते,
सैनिक सीमा पर मरते हैं।

दिलचस्पी लेते हैं अमीर,
घुटते जाते केवल गरीब।
आज का ताजा खबर।
आज का ताजा खबर।


-प्रो०अवधेश कुमार ' शैलज ', पचम्बा, बेगूसराय।
मेरी पूर्व रचित कविता 'आज का ताजा खबर' का परिवर्धित एवं संशोधित रुप।